मध्प्रदेश

गली-चौराहों पर मवेशियों ने फिर जमाया कब्जा

नरसिंहपुर। गर्मी की शुरूआत के साथ ही गली-चौराहों व सड़कों पर आवारा मवेशियों की धमा-चौकड़ी बढ़ने लगी है। हर साल की तरह इस बार भी इस समस्या के विकराल होने के पूर्व जिला प्रशासन व नगर पालिका को इस दिशा में सार्थक कदम बढ़ाने जरूरी है। जिला मुख्यालय नरसिंहपुर के सभी प्रमुख मार्गों से लेकर गली-चौराहों में गौवंशों के साथ-साथ गधे-खच्चर व अन्य पशु स्वच्छंद विचर रहे हैं। ऐसी स्थिति में वाहन चालकों को जहां हर पल दुर्घटना का भय रहता है, वहीं यातायात भी बुरी तरह बाधित होता है। रेल्वे स्टेशन से लेकर गांधी चौराहा तक जहां-तहां विचरते आवारा पशुओं की यह समस्या गर्मी के साथ और भी बढ़ेगी। शहर की मॉडल रोड से लेकर मेन रोड, श्याम टॉकीज रोड व कॉलोनियों के मार्गों में आवारा मवेशियों के झुंड के झुंड दिन-रात नजर आ रहे हैं।

सब्जी मंडी में हर रोज मचाते हैं अफरा-तफरी स्थानीय इतवारा बाजार स्थित सब्जी मंडी परिसर में इन मवेशियों का दिन-रात डेरा रहता है। इनके द्वारा हर रोज किसानों व सब्जी व्यवसासियों को आर्थिक क्षति पहुंचायी जा रही है। व्यवसायियों का कहना है कि हम नगर पालिका को हर दिन टैक्स देते हैं, पर बाजार परिसर में सुविधायें दिये जाने पर नपा कोई रूचि नहीं दिखाती। इतने बड़े बाजार में पेयजल तक की व्यवस्था नहीं है। साफ-सफाई में होने वाली हीला-हवाली तो सामान्य बात है। वहीं आवारा मवेशियों द्वारा हर दिन प्रत्येक किसान व व्यवसायी का कम से कम 50 से 100 रुपये तक का नुकसान किया जाता है। पशु पालकों की बेरूखी से सड़क पर आये गौवंश पशु पालकों की बेरूखी के चलते ये पालतू पशु आवारा की श्रेणी में आ गये हैं। इन कथित गौभक्तों के लिए गायें सिर्फ दूध देने तक ही माता होती हैं। दूध देना बंद होते ही ये गायों को बाहर का रास्ता दिखा देते हैं, ताकि उनके खाने-पीने में उन्हें कोई खर्च न करना पड़े।

इन हालातों के बीच कचराघरों में मुंह मारना इन पशुओं की मजबूरी बन जाती है और ये जूठन के साथ विषाक्त खाद्य पदार्थ व पन्नियां खाकर कभी बीमार पड़ती हैं तो कभी मौत के मुंह में चले जाते हैं। सड़क पर विचरने के कारण कई बार ये हादसे का सबब भी बनते हैं। कभी खुद तो कभी राहगीर इन हादसों का शिकार हो जाते हैं। गाय के नाम पर राजनीति करने वाले तथाकथित नेता भी गौवंशों की इस हालत पर चिंतित नही हैं। ऐसे में प्रशासन व नगर पालिका का दायित्व बनता है कि वे किस तरह इन गौवंशों व नागरिकों को इस समस्या से मुक्ति दिलाये? हालांकि अब तक इनके सारे प्रयास निष्फल ही साबित हुए हैं पर विडंबना यह है कि आखिरी उम्मीद भी इन्ही पर आकर टिकती है। परिषद के सामने है ये बड़ी समस्या पर विकल्प भी जरूरी तहसील कार्यालय नरसिंहपुर के पास स्थित कांजी हाऊस की क्षमता सिर्फ 30 मवेशियों को रखने की है, जबकि शहर में सैंकड़ों मवेशी आवारा विचर रहे हैं। यदि हाका गैंग चला भी दी जाये तो पकड़े गये मवेशियों को कहां रखा जायेगा? ऐसी स्थिति में हाका गैंग की निरंतर सक्रियता संभव नहीं है। इससे भी बदतर स्थिति यह है कि कांजी हाऊस में बंद मवेशियों को छुड़ाने के लिए उनके पालक बहुत ही कम आते हैं। ऐसे में 8 दिन बाद इन मवेशियों को इश्तहार जारी करके नीलाम किये जाने का नियम है, पर विडंबना यह है कि इन मवेशियों को खरीदने में लोग रूचि नहीं दिखाते, हालांकि नीलामी प्रक्रिया भी कभी-कभार ही होती है।

ऐसे में बंद गौवंशों को परमहंसी की गौशाला भेज दिया जाता है। गौशाला गायों को तो ले लेती है पर बछड़ों व बैलों में रूची नहीं दिखाती। यदि कांजी हाऊस में बंद मवेशियों को मालिक छुड़ायेंगे नहीं, गौशालाओं में जगह नहीं होगी, तो प्रशासन को अन्य विकल्प की तलाश करनी चाहिए। मप्र शासन द्वारा जिले में 30 गौशालाओं का निर्माण प्रस्तावित है। इन गौशालाओं के निर्माण व तमाम व्यवस्थाएं होने के बाद उम्मीद है कि हालात पटरी पर आयेंगे। इनका कहना है समय-समय पर हाका गैंग चलायी जाती है, पर उसे निरंतर चलाना संभव नहीं है। कांजी हाऊस में पशुओं के रहने की स्थिति में दूसरे पशु पकड़कर ले भी आये तो उन्हे कहां रखेंगे? गौशालाओं से भी सांड व बछड़ों को वापस लौटा दिया जाता है। फिर भी हमसे जो बन रहा है प्रयास कर रहे हैं।

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